Skip to main content

Nafrat ki dhoop .....

      Nafrat ki dhoop me barsaat se pehle,
      Halaat na the aise teri mulaqaat se pehle,

      Har kisi ko hamdard samajh lete the,
      Hum bhi kitne saada the mohabbaton ke tajurbaat se pehle,

      Ye barish ye hawa ye dhanak ye mausam,
      Kis kis se mohabbat thi teri aane  se pehle,

      Bikhre to bas aise toot ke bikhre,
      Log dete the misaal hamari tumse milne se pehle,

      Tu ye na samajh tujhse ulfat gaye dinon ki baat hai,
      Hum aaj bhi sochte hain tujhe apni jaan se pehle..

Comments

Popular posts from this blog

मर्यादा जीवन भर पूजी....

मर्यादा जीवन भर पूजी, बदले मे वनवास मिला... बड़ी सती थी जिसको कहते जग का तब उपहास मिला... शिव का आधा अंग बनी, पर बदले मे थी आग मिली... सत्यमूर्ति बन भटक रहा था, बुझी पुत्र की साँस मिली... इंद्रिय सारी जीत चुका था, उसको पुत्र वियोग मिला... विष प्याला उपहार मिला था कृष्ण भक्ति का जोग लिया... दानवीर, आदर्श सखा, पर छल से था वो वधा गया... ज्ञान मूर्ति इक संत का शव भी, था शैय्या पर पड़ा रहा... धर्म हेतु उपदेश दिया पर पूरा वंश विनाश मिला... हरि के थे जो मात पिता उनको क्यूँ कारावास मिला... मात पिता का बड़ा भक्त था, बाणों का आघात हुआ... ऐसे ही ना जाने कितने अच्छे जन का ह्रास हुआ.... थे ऐसे भी जो पाप कर्म की परिभाषा का अर्थ बने... जो अच्छाई को धूल चटाते, धर्म अंत का गर्त बने... जो अत्याचार मचाते थे, दूजो की पत्नी लाते थे... वो ईश के हाथों मरते थे, फिर परम गति को पाते थे... अब ये बतलाओ सत्य बोल मैं कौन सा सुख पा जाऊँगा... मैं धर्म राह पे चला अगर,दुख कष्ट सदा ही पाऊँगा... नाम अमरता नही चाहिए, चयन सुखों का करता हूँ... मैं अच्छा कैसे बन जाऊं, मैं अच्छाई से...

दुर्गा का मन्दिर

बाबू ब्रजनाथ कानून पढ़ने में मग्न थे, और उनके दोनों बच्चे लड़ाई करने में। श्यामा चिल्लाती, कि मुन्नू मेरी गुड़िया नहीं देता। मुन्नु रोता था कि श्यामा ने मेरी मिठाई खा ली। ब्रजनाथ ने क्रुद्घ हो कर भामा से कहा—तुम इन दुष्टों को यहॉँ से हटाती हो कि नहीं? नहीं तो मैं एक-एक की खबर लेता हूँ। भामा चूल्हें में आग जला रही थी, बोली—अरे तो अब क्या संध्या को भी पढ़तेही रहोगे? जरा दम तो ले लो। ब्रज०--उठा तो न जाएगा; बैठी-बैठी वहीं से कानून बघारोगी ! अभी एक-आध को पटक दूंगा, तो वहीं से गरजती हुई आओगी कि हाय-हाय ! बच्चे को मार डाला ! भामा—तो मैं कुछ बैठी या सोयी तो नहीं हूँ। जरा एक घड़ी तुम्हीं लड़को को बहलाओगे, तो क्या होगा ! कुछ मैंने ही तो उनकी नौकरी नहीं लिखायी! ब्रजनाथ से कोई जवाब न देते बन पड़ा। क्रोध पानी के समान बहाव का मार्ग न पा कर और भी प्रबल हो जाता है। यद्यपि ब्रजनाथ नैतिक सिद्धांतों के ज्ञाता थे; पर उनके पालन में इस समय कुशल न दिखायी दी। मुद्दई और मुद्दालेह, दोनों को एक ही लाठी हॉँका, और दोनों को रोते-चिल्लाते छोड़ कानून का ग्रंथ बगल में दबा कालेज-पार्क की राह ली। २ सावन का महीना था। आ...